देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार। इस कविता भाग की व्यख्या करते समय हमारे अध्यापक बन्धुओं के मन में अभी शंकाएँ बाकी है। इन शंकाओं को दूर करने केलिए सहायता करें...